वोटरशिप पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (संसदीय कार्यवाही संबंधी )

1. वोटरशिप अधिकार के रूप में वोटरों को हर महीना 6 या 7 हजार रूपया देने के प्रस्ताव पर क्या भारत की संसद में विचार हुआ?

वोटरशिप अधिकार का मुद्दा देश के वोटरों को देने के लिए लोकसभा में 112 सांसदों ने और राज्यसभा में 25 सांसदों ने याचिका प्रस्तुत की। यह याचिका श्री विश्वात्मा व अन्य की थी। अधिक जानकारी के लिए देखिये —संसद में वोटरशिप अधिकार पर हुई कार्यवाही देखें

2. वोटरशिप का अधिकार देने के लिए लोकसभा में 112 सांसदों द्वारा याचिका प्रस्तुत करने के बाद क्या हुआ?

लोकसभा में तत्कालीन याचिका समिति के अध्यक्ष श्री प्रभनाथ सिंह ने देश के वोटरों को वोटरशिप का अधिकार देने का विरोध किया. इसीलिए याचिका पर कोई कार्यवाही नहीं होने दिया।

3. वोटरशिप का अधिकार देने के लिए 25 सांसदों ने जब राज्यसभा में याचिका प्रस्तुत किया तो उसका परिणाम क्या हुआ?

राज्यसभा में तत्कालीन याचिका समिति के अध्यक्ष श्री भगत सिंह कोश्यारी ने अपने अधिकार क्षेत्र के अनुसार याचिका का समर्थन किया और हर संभव कार्यवाही भी किया. राज्यसभा ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया. इस समिति को गोयल कमेटी के नाम से जाना जाता है. इस विशेषज्ञ समिति ने वोटरशिप का अधिकार दिए जाने की बात सिद्धांत रूप में मंजूर कर लिया. किंतु तत्कालीन राज्यसभा अध्यक्ष / भारत के उपराष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी ने वोटरशिप का अधिकार दिए जाने का विरोध किया. इसके कारण मामला रुक गया।

4. वोटरशिप पर संसद में कानून न बन पाने के क्या कारण थे?

(1) केवल धनवानों को ही राष्ट्र मानने वाले नकली राष्ट्रवादी मानते हैं कि वोटरशिप का पैसा बंटने से देश के नागरिकों की मजदूरी का रेट बढ़ जायेगा। वे ज्यादा सुखी हो जायेंगे। इससे खेत-कारखाने में पैदा होने वाली वस्तुओं की कीमत बढ़ जायेगी। इसलिए दूसरे देशों में इन वस्तुओं की बिक्री कम हो जायेगी। यानि निर्यात घट जायेगा। क्योंकि वोटरशिप का अधिकार अपने देश के साथ साथ दूसरे देशों में लागू नहीं हो रहा है। इसलिए नकली राष्ट्रवादी अनादिकाल से बहुसंख्यक जनता को गुलाम व जान बूझकर पैसे की तंगी में बांधकर रखे रहे, वर्तमान में देश और राष्ट्र के नाम पर उनको आर्थिक गुलाम बनाकर रखे हुए हैं और भविष्य में इसी तरह हजारों सालों तक जातिभक्ति, धर्मभक्ति, देशभक्ति और राष्ट्रभक्ति के नाम पर गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं। इस तरह के नकली राष्ट्रवादी और स्वाभिमानवादी इस झूठ के प्रचार में खुद लगे हैं और देश में यह बताने में बड़ी रकम खर्च कर रहे हैं कि वोटरशिप असम्भव है और व्यावहारिक नहीं है। उनका विश्वास है कि इस झूठ के प्रचार से वे आम जनता को और मध्यम वर्ग को वोटरशिप आन्दोलन से नहीं जुड़ने देंगे।

(2) पैसे के सुख ने अगड़ी जातियों के घर-घर में नेता पैदा कर दिया। वोटरशिप का पैसा मिलेगा, तो दलितों के घर में भी नेता पैदा हो जाएंगे। इससे सभी दलित किसी एक ही दलित नेता के झंडे तले खड़े नहीं होंगे। इस भय से रामदास अठावले के अलावा अधिकांश दलित नेताओं ने संसद में वोटरशिप का विरोध किया।

(3) गरीबी खत्म हो जाने पर गरीब लोग कम्युनिस्ट पार्टी के शासन की जरूरत ही नहीं महसूस करेंगे। यह नतीजा निकाल कर कम्युनिस्ट पार्टियों ने विरोध किया। वोटरशिप से मजदूरी बढ़ जाएगी, इस भविष्यवाणी को सही मानकर मजदूरों की मेहनत से अमीरी का सुख भोगने वालों ने विरोध किया।

(4) जो पार्टी अध्यक्ष वोटरशिप का समर्थन करेगा, उसे चुनाव लड़ने के लिए अमीर लोग चंदा देना बंद कर देंगे- अमीरों की इस धमकी में आ कर बड़ी पार्टियों के अध्यक्षों ने वोटरशिप के समर्थन में आगे कुछ भी करने से सांसदों को रोका।

(5) राज्य सभा की एक्सपर्ट कमटी यानी गोयल कमेटी की सिफारिशों को उच्च स्तरीय राजनीतिक साजिश के तहत लटका दिया

5. लोकसभा के सांसदों ने संसद में याचिका प्रस्तुत करने के लिए क्या किया था?

सांसदों ने अपने-अपने सदन में सदन के अध्यक्ष को नोटिस दिया था। सांसदों ने लोकसभा में नियम 168 के तहत नोटिस दिया था. जिसमें लिखा था-

प्रेषक,

अधोहस्ताक्षरी संसद सदस्य

सेवामें,

लोकसभा,

संसद भवन, नई दिल्ली

विषय- लोकसभा में नियम 168 के तहत याचिका प्रस्तुत करने के लिए नोटिस।

महोदय,

लोकसभा के चुनाव में मतदान का अधिकार रखने वाले भारत संघ के सभी मतकर्त्ताओं को, इस याचिका में-मतकर्त्तावृत्ति या वोटरशिप के नाम से परिभाषित, जन्म के आधार पर वित्तीय अधिकार देकर,

लोकतंत्र का और अधिक न्यायप्रिय ढांचा विकसित करने,

संघ के नागरिकों के बीच जन्म के आधार पर बरते जा रहे आर्थिक भेदभाव पर अंकुश लगाने,

न्यूनतम आर्थिक समता कायम करने,

भारत संघ के सभी मतकर्त्ताओं की नियमित रूप से आमदनी का जरिया सुनिश्चित करने,

अत्यंत निर्धन परिवारों द्वारा बच्चाें की शादी विवाह सम्भव बनाने में, 

मानवीय गरिमा व सुरक्षा के साथ जी पाने में, और

आर्थिक तंगी के कारण हो रही आत्महत्याओं को रोकने में, इन परिवारों को सक्षम बनाने,

मतकर्त्तावृत्ति के माध्यम से प्रमुख याचिकाकर्ता द्वारा अहिंसक जीवन जी पाना व विवाह कर पाना, सम्भव बनाने, 

-के संबंध में आवश्यक कार्यवाही करने के लिए अधेहस्ताक्षरी एवं अन्य याचिका देने वाले भारत की माननीय लोकसभा से विनम्र प्रार्थना करते हैं।

6. राज्यसभा के सांसदों ने संसद में याचिका प्रस्तुत करने के लिए क्या किया था?

सांसदों ने अपने-अपने सदन में सदन के अध्यक्ष को नोटिस दिया था। सांसदों ने लोकसभा में नियम 168 के तहत नोटिस दिया था. जिसमें लिखा था-

प्रेषक,

अधोहस्ताक्षरी संसद सदस्य

सेवामें,

लोकसभा,

संसद भवन, नई दिल्ली

विषय- लोकसभा में नियम 168 के तहत याचिका प्रस्तुत करने के लिए नोटिस।

महोदय,

लोकसभा के चुनाव में मतदान का अधिकार रखने वाले भारत संघ के सभी मतकर्त्ताओं को, इस याचिका में-मतकर्त्तावृत्ति या वोटरशिप के नाम से परिभाषित, जन्म के आधार पर वित्तीय अधिकार देकर,

लोकतंत्र का और अधिक न्यायप्रिय ढांचा विकसित करने,

संघ के नागरिकों के बीच जन्म के आधार पर बरते जा रहे आर्थिक भेदभाव पर अंकुश लगाने,

न्यूनतम आर्थिक समता कायम करने,

भारत संघ के सभी मतकर्त्ताओं की नियमित रूप से आमदनी का जरिया सुनिश्चित करने,

अत्यंत निर्धन परिवारों द्वारा बच्चाें की शादी विवाह सम्भव बनाने में, 

मानवीय गरिमा व सुरक्षा के साथ जी पाने में, और

आर्थिक तंगी के कारण हो रही आत्महत्याओं को रोकने में, इन परिवारों को सक्षम बनाने,

मतकर्त्तावृत्ति के माध्यम से प्रमुख याचिकाकर्ता द्वारा अहिंसक जीवन जी पाना व विवाह कर पाना, सम्भव बनाने, 

-के संबंध में आवश्यक कार्यवाही करने के लिए अधेहस्ताक्षरी एवं अन्य याचिका देने वाले भारत की माननीय लोकसभा से विनम्र प्रार्थना करते हैं।

7. राज्यसभा के सांसदों ने अपनी नोटिस में क्या लिखा था?

राज्य सभा के सांसदों ने सदन में नियम 144 के तहत नोटिस दिया था. जिसमें लिखा था-

प्रेषक,

अधोहस्ताक्षरी संसद सदस्य

सेवामें,

राज्य सभा,

संसद भवन, नई दिल्ली

विषय- राज्य सभा में नियम 144 के तहत याचिका प्रस्तुत करने के लिए नोटिस।

महोदय,

1. वोटरों के पहचान पत्रों को हटाकर उसकी जगह ए.टी.एम. कार्ड दे दिया जाये, जिससे देश की साझी सम्पत्ति से होने वाली नकद राष्ट्रीय आय में वोटरों के हिस्से का भुगतान किया जाये। 

2. विकास में सबको भागीदारी देने के एक उपाय के रूप में , गरीबी और आर्थिक गुलामी खत्म करने के एक उपाय के रूप में , न्यूनतम आर्थिक समानता और आर्थिक अवसरों की समानता को सुलभ कराने के उपाय के रूप में वोटरों को वोटरशिप अधिकार दिया जाये। 

3. लोकसभा के प्रत्येक प्रत्याशी को लोकसभा के चुनाव में प्राप्त वोट के अनुपात में धनराशि दी जाये, जिससे चुनाव खर्च का बोझ सरकार पर डाला जा सके। यह मामला बहुत दिनों से लम्बित भी है।

8. लोकसभा में जिन सांसदों ने नोटिस दिया था, क्या उनके नामों की सूची उपलब्ध है?

लोकसभा में जिन सांसदों ने वोटरशिप अधिकार देने के लिए सदन में याचिका प्रस्तुत करने के लिए नोटिस दिया था, उनके नामों की दलवार और प्रदेश वार सूची के लिए निम्नलिखित लिंक क्लीक करें – वोटरशिप अधिकार के लिए लोकसभा में याचिका प्रस्तुतकर्ता संसद सदस्यों की सूची

9. राज्यसभा में ने जिन सांसदों ने वोटर से अधिकार देने के लिए नोटिस दिया था क्या उनके नामों की सूची उपलब्ध है?

राज्यसभा में जिन 25 सांसदों ने नोटिस दिया था, उनके नामों की सूची निम्नलिखित हैं-

राज्यसभा में याचिका प्रस्तुत करने वाले राज्यसभा के 21 संसद सदस्यों का प्रतिहस्ताक्षरित करने का तिथिक्रमानुसार विवरण-

नाम प्रदेश दल

श्री ईसम सिंह उ० प्र० निर्दलीय

श्री इन्द्र मुनि बोरा असम भाजपा

श्री जयंतीलाल बरोट गुजरात भाजपा

श्री सुरेन्द्र लाठ उडीसा भाजपा

श्री सुरेश भारद्वाज हि. प्रदेश भाजपा

श्री नारायण सिंह केसरी म० प्र० भाजपा

श्री राजनीति प्रसाद बिहार राजद

श्री टी0 आर0 जीलियांग नागालैंड एन.पी.एफ.

श्री महमूद ए0 मदनी उ० प्र० रा.लो.द.

श्री भगवती सिंह उ० प्र० सपा

श्री उदय प्रताप सिंह उ० प्र० सपा

श्री जनेश्वर मिश्र उ० प्र० सपा

श्री बृजभूपण तिवारी उ० प्र० सपा

श्री कमल अख्तर उ० प्र० सपा

श्री वीरपाल सिंह यादव उ० प्र० सपा

कैप्टन श्री जयना निशाद बिहार भाजपा

श्री राम नारायण साहू उ०0 प्र0 सपा

श्री लालमिंग लियाना मिजोरम एम.एन.एफ.

श्री अबू आसिम आजमी उ० प्र० सपा

श्री दिनेश त्रिवेदी प० बंग ए.आई.टी.सी.

श्री आमिर आलम खान उ० प्र० सपा

10. क्या सांसदों ने लोकसभा में वोटरों को वोटरशिप अधिकार दिये जाने के मुद्दे पर बहस की मांग किया था?

लोक सभा में 30 सांसदों ने तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी को नोटिस देकर बहस की मांग किया था।

11. लोकसभा के सांसदों ने सदन में वोटरशिप अधिकार पर बहस की मांग करते हुए अपने नोटिस में क्या लिखा था?

लोकसभा के सांसदों ने जिस नोटिस को प्रस्तुत करते हुए वोटरशिप अधिकार दिए जाने के मुद्दे पर बहस की मांग किया था, उस नोटिस की मूल प्रति देखने के लिए निम्नलिखित लिंक क्लीक करें –

वोटरशिप अधिकार पर लोक सभा में बहस के लिए डी गयी नोटिस की मूल प्रति

12. लोकसभा में नोटिस देकर जब सांसदों ने बहस की मांग किया तो लोकसभा में बहस हुई, या नहीं?

सांसदों के एक समूह ने बहस के लिए केवल नोटिस ही नहीं दिया, अपितु तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी से व्यक्तिगत मुलाकात भी किया. उनको वोटरशिप अधिकार के विषय में समझाया। लोकसभा अध्यक्ष ने यह कहा कि वह अपनी ओर से तैयार हैं किंतु इसके लिए संसदीय कार्य मंत्री श्री प्रियरंजन दास मुंशी के माध्यम से प्रधानमंत्री को भी विश्वास में लेना आवश्यक है। श्री विश्वात्मा ने तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री श्री प्रियरंजन दास मुंशी को समझाया और बहस के लिए राजी किया। सन 2008 में बजट सत्र के अंतिम सप्ताह में 6 मई को बहस तय हुई, किन्तु बहस नहीं हुई।

13. क्या सांसदों वोटरशिप अधिकार दिलाए जाने के विषय में अपने प्रयासों की जानकारी मीडिया को दिया?

2 मई 2008 को कई सांसदों ने संसद भवन में एक प्रेस वार्ता बुलाकर इस विषय में जानकारी दिया. इस प्रेस वार्ता को श्री विश्वात्मा ने संबोधित किया था. इस प्रेस वार्ता का समाचार पूरे देश में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ था।

14. लोकसभा में वोटरशिप पर हुई बहस का परिणाम क्या हुआ?

3 मई 2008 को समाचार पत्रों में वोटर शिप अधिकार के मुद्दे पर संसद में बहस के शीर्षक से समाचार छपा। इस समाचार पर देश के कारपोरेट घरानों और पार्टी अध्यक्षों की नजर पड़ी। एक उच्चस्तरीय साजिश शुरू हुई और संसद के बहस को रोकने के लिए बहस के 1 दिन पूर्व 5 मई 2008 को संसद के आकस्मिक 17 साल का फैसला कर लिया गया। इस फैसले को तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने बहुत भारी मन से स्वीकार किया था।

15. राज्यसभा में जब सांसदों ने वोटरशिप अधिकार के लिए याचिका प्रस्तुत किया, तो उसका परिणाम क्या हुआ?

राज्यसभा में याचिका प्रस्तुत किया गया तो याचिका समिति ने इस याचिका पर भारत सरकार के मंत्रालयों का जवाब मांगा। भारत सरकार के मंत्रालयों ने इसका विरोध किया। परिणामस्वरूप याचिका समिति ने अर्थशास्त्र और संविधान विशेषज्ञों की राय मांगी। संविधान विशेषज्ञ के रूप में डॉक्टर सुभाष कश्यप ने और अर्थशास्त्री के तौर पर डॉ भरत झुनझुनवाला ने वोटरों को वोटरशिप अधिकार दिए जाने के समर्थन मैं अपनी अपनी रिपोर्ट राज्यसभा में प्रस्तुत किया।

16. क्या अर्थशास्त्रियों और संविधान विशेषज्ञों की रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद राज्यसभा ने वोटरशिप अधिकार दिए जाने का प्रस्ताव मान लिया था?

नहीं। संविधान विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों के समर्थन के बाद राज्यसभा की याचिका समिति ने संसद के अधिकारियों कि एक विशेषज्ञ समिति का गठन कर दिया था और उसके रिपोर्ट मांगी। संसद की इस विशेषज्ञ कमेटी को ही गोयल कमेटी के नाम से जाना जाता है।

17. गोयल कमेटी ने वोटरशिप अधिकार दिए जाने का समर्थन किया या विरोध?

गोयल कमेटी ने याचिकाकर्ता श्री विश्वात्मा को नोटिस भेजकर संसद में 23 नवंबर 2011 को बुलाया। श्री विश्वात्मा से गोयल कमेटी के सदस्यों ने प्रश्नोत्तर किया और यह समझने की कोशिश किया की , क्या यह प्रस्ताव लागू करना संभव है? दुनिया के किन किन देशों में इस तरह का प्रस्ताव चल रहा है? ऐसे प्रस्ताव को कानून का दर्जा दे देने के बाद भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा? श्री विश्वात्मा की बात सुनने के बाद गोयल कमेटी के सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से वोटरशिप अधिकार दिए जाने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया और याचिका को सदन में प्रस्तुत करने की सिफारिश कर दिया। किंतु तत्कालीन सभा के सभापति और भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने इस अधिकार के विरुद्ध साजिश रचने वालों के मोहरे के रूप में काम किया और राज्यसभा के तत्कालीन महासचिव श्री मल्होत्रा को ऐसी रिपोर्ट करने का आदेश दिया, जिससे इस याचिका पर कार्यवाही रोकी जा सके। यही हुआ. राज्यसभा के महासचिव ने यह लिख दिया कि बेहतर हो कि इस विषय पर लोकसभा विचार करें। जबकि राजसभा के महासचिव को यह बात पहले से मालूम थी कि लोकसभा की याचिका समिति ने तत्कालीन याचिका समिति के अध्यक्ष श्री प्रभु नाथ सिंह याचिका पर कार्यवाही करने के विरुद्ध हैं।

18. वोटरशिप अधिकार दिए जाने  के मामले पर गठित गोयल कमेटी ने जो रिपोर्ट दिया , क्या वह रिपोर्ट उपलब्ध है?

हां, गोयल कमेटी के फूल नीचे का लिंक क्लिक करके हिंदी और अंग्रेजी में देखा जा सकता है। वोटरशिप के मुद्दे पर राज्यसभा द्वारा गठित गोयल समिति की सिफारिश-

गोयल कमेटी की रिपोर्ट

19. क्या गोयल कमेटी की सिफारिशों को नहीं माने जाने के बाद वोटरशिप अधिकार दिलाए जाने का प्रयास बंद हो गया?

नहीं, यह प्रयास बंद नहीं हुआ. किंतु अब यह विषय आम जनता को बताने का फैसला किया गया. इसके लिए एक राजनीतिक पार्टी का गठन किया गया. जिसका नाम है- वोटर्स पार्टी इंटरनेशनल.

20. क्या वोटरशिप अधिकार के लिए काम करने वाला कोई गठबंधन भी देश में मौजूद है?

देश में बहुत सही पार्टियों ने वोटरशिप के मुद्दे पर को अपना लिया. देश की सैकड़ों पार्टियां इस मुद्दे पर जन जागरण कर रही हैं. ऐसा ही एक गठबंधन है, जिसका नाम है- भारतीय जनतांत्रिक गठबंधन

21. संसद में वोटरशिप प्रस्ताव पर बड़े दलों का रुख क्या रहा?

आम तौर पर धारणा है कि भारतीय जनता पार्टी, भाजपा गरीबों की दुश्मन पार्टी है। किन्तु संसद में चले वोटरशिप अभियान ने इसे गलत साबित कर दिया है। कारण यह है कि वोटरशिप का समर्थन करने वाले कांग्रेस के सांसदों की संख्या की तुलना में भाजपा के सांसदों की संख्या ज्यादा थी। कांग्रेस के 11 सांसद थे और भाजपा के 48 सांसद। यह मजेदार बात रही कि दलितों व पिछड़ों के स्वाभिमान पर काम करने वाले सांसदों ने ‘असंभव’ या ‘देश को निकम्मा बनाने वाला प्रस्ताव’ कहकर वोटरशिप का विरोध किया। मजेदार बात यह भी थी कि भाजपा व कांग्रेस के दलित सांसदों ने वोटरशिप का जोरदार समर्थन किया। संसद के सर्वे में जो नतीजा निकला, कमोवेश वही नतीजा आम जनता में हुये सर्वे में भी निकल रहा है। जातीय, साम्प्रदायिक, भाषाई, क्षेत्रावादी व संकीर्ण राष्ट्रवादी राजनीति करने वाले समाजसेवी व नेता लोगों ने भी वोटरशिप का विरोध किया। ओ. मनोवृत्ति के लोगों को मछली रूपी वोटरों को पकड़ने में केचुए की तरह इस्तेमाल करने में भाजपा व कांग्रेस- यही दो पार्टियां सबसे आगे दिखीं। इन दोनों दलों में निचले कैडर में ओ. वृत्ति के सज्जन लोगों को चुनाव लड़ने के लिये टिकट दिया जाता हैं। इन्हीं चुम्बकों के सहारे वोट खींची जाती है, किन्तु चुनाव जीतने के बाद पांच साल तक इनकी बातें सुनी नही जाती। ये ‘ओ’ वृत्ति के सज्जन केवल आम जनता के प्रति ही सज्जन नहीं होते अपितु एबी. वृत्ति के पार्टी अध्यक्षों व उनकी पालतू एबी. वृत्ति वाली चैकड़ी (Gang) के प्रति भी सज्जन होते हैं। पार्टी अध्यक्षों की चैकड़ी (Gang) में घुसने के लिये जिस आक्रामकता की जरूरत होती है, ‘दानी वृत्ति’ होने के नाते वो आक्रामकता इन ओ. वृत्ति के सज्जनों में नहीं होती। इसीलिये वोटरशिप के प्रस्ताव को विश्वात्मा भरत गाँधी के कहने पर एबी. नेताओं द्वारा चलाई जा रही पार्टियों के ओ. वृत्ति के सांसदों ने संसद में तो पेश कर दिया, किन्तु अपनी-अपनी पार्टियों के अध्यक्षों की चैकड़ी (Gang) के अत्याचार का विरोध नहीं कर सके। इसकी वजह से बहुसंख्यक ‘ओ’ जनों पर अल्पसंख्यक ‘एबी’ जनों का राज और परिणामस्वरूप नये नाम व नये रूप में दास प्रथा बदस्तूर कायम है.